Monday, October 3, 2022

गेहूँ (Wheat) की खेती,उन्नत किस्में, रोग प्रबंधन, खरपतवारनाशक तथा उत्पादन की पूरी जानकारी

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गेहूं की खेती की जानकारी

गेहूँ (Wheat) भारत की रबी फसलों मे एक महत्वपूर्ण फसल है खाद्य फसलों मे धान के बाद गेहू का दूसरा स्थान है। गेहूँ मे उपलब्ध प्रोटीन की मात्रा, नइसीन, थाऐनिन तथा ग्लूटेन के कारण यह न सिर्फ एक पौष्टिक आहार है बल्कि बिस्कुट, केक, ब्रेड उधोग के लिए अति महत्वपूर्ण फसल है. गेहूँ का भूसा पशुचारा का अच्छा स्त्रोत है. जिससे किसानों को पशुओ के लिए चारा खरीदने की आवश्यकता नहीं पङती है।


गेहूं की खेती के लिए तापमान

गेहूँ ठंडे मौसम की फसल है। इसके लिए विभिन्न अवस्थाओ पर भिन्न-भिन्न तापमान की आवश्यकता होती है। अंकुरन के लिए इष्टतम तापमान 20-25 डिग्री से0 और बढ़ाबर के लिए इष्टतम तापमान 25 डिग्री से0 तथा दाना भरते समय/पकने के समय इष्टतम औसत तापमान 14-15 डिग्री से0 उपयुक्त है जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान का बढ़ाना और पानी का कम होना अनुमानित किया जा सकता है जलवायु परिवर्तन के कारण गेहू की उत्पादकता पर पतिकूल प्रभाव पर सकता है।


मिट्टी

गेहूँ की खेती के लिए दोमट मिट्टी सवोत्तम होती है. जल निकासी और सिचाई के उचित प्रबंधन से मटियार और रेतीली मिट्टी मे भी गेहूँ की खेती की जा सकती है. गेहूँ के लिए मिट्टी का पी0 एच0 मान 7.0 अच्छा माना जाता है। अम्लीय या क्षारीय मिट्टी मे गेहू की अच्छी पैदावर नहीं होती है।


बुआई का समय

1. सीचीत समय से बुआई 2. सीचीत विलंब से बुआई कुछ क्षेत्रों मे असीचीत अवस्था मे भी गेहूँ की एकल या मिलवा खेती की जाती है।

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भूमि की तैयारी

गेहूँ की खेती मे भूमि की तैयारी को लेकर धरणा मे काफी बदलाव आया है. पहले मिट्टी को मैदा की तरह ही बहुत ही भुरभुरी बनाने हेतु अनेक प्रकार की जुटाई की जाती थी। अब गेहूँ की खेती मे मात्र एक या दो जुटाई करने से ही अगर खेत खरपतवार रहित हो जाए, तो भूमि मे प्रायप्त नमी रहे तथा बीज का आसानी से समान दूरी पर बुआई हो जाए। लेकिन अब खरीफ के फसल की कटाई के बाद खेत को बिना जुटाई किए हुए, शून्य जुटाई मशीन से गेहूँ की बुआई का प्रचलन भी अब धीरे-धीरे बढ़ रहा है। इस विधि से गेहूँ की बुआई करने से किसानों की लागत मे कमी आती है जो की पहले के अपेक्षा मे इस विधि से बुआई करने मे लागत मे तो कमी आती ही है तथा साथ ही किसानों की समय की भी बचत होती है।


बीजोपचार

भीटाभेक्स, थिरम या एग्रोसेन जी0 एन नामक किसी एक दावा का 2.5 ग्राम/किलो बीज की दर से बीजोपचार करे। उपचारित बीज से बीज जनित रोग होने का भय नहीं रहता है तथा अंकुरण भी अच्छा होता है।


पंक्ति से पंक्ति की दूरी तथा बुआई की गहराई

1. समय से बुआई करने पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20.0-22.5 cm तथा बिलंब से बुआई करने पर 15-20 cm की दूरी रखे। 2.गेहूँ की खेती मे बीज बोने की गहराई बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। बीज की बुआई 4-5 cm की गहराई पर करे. अधिक गहराई पर बुआई करने से पौधों को उगने मे 2-3 दिनों का बिलंब हो सकता है।


बुआई की विधि

गेहूँ की बुआई की मुखतः तीन विधि है। 1. छिटकवा विधि 2.सीड ड्रिल विधि 3. शून्य जुटाई मशीन विधि

1. छिटकवा विधि :- कल्टीवेटर लगे ट्रैक्टर से खेत की जुटाई बीज की छीटकवा विधि से बुआई करते है। पुनः कल्टीभर से बीज को मिलकर खेत मे पाटा लगा दिया जाता है. इस विधि से की गई बुआई मे न तो पंक्ति की दूरी और न ही गहराई का ध्यान रखा जाता है।

2.सीड ड्रिल विधि :- सीड ड्रिल विधि मे बीज बोने का एक कृषि यंत्र होता है इसमे बीज और उर्वरक के लिए अलग-अलग बक्सा होता है खेत की तैयारी के उपरांत यंत्र के उपयुक्त पंक्तीयो की दूरी तथा गहराई के हिसाब से बीजाई की जाती है।

3. शून्य जुटाई मशीन विधि :- सीड ड्रिल मशीन की तरह ही शून्य जुटाई मशीन भी बुआई का कार्य करता है। फ़र्क सिर्फ इतना है की इस यंत्र मे बुआई करने के पूर्ब जुटाई की आवश्यकता नहीं होती है यंत्र मे हल की फाल की जगह ब्लेड लगा रहता है। जिससे मिट्टी मे एक चीरा बनता है और खाद तथा बीज की बुआई उपयुक्त स्थान पर हो जाती है। यंत्र से बीज गिरने का दर तथा गहाई का आवश्यकतानुसार बुआई से पूर्व ही व्यवस्थित कर लेना आवश्यक होता है। बुआई के बाद खेत मे पाटा लगाने का आवश्यकता नहीं होता है।

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सिचाई तथा जल प्रबंधन

गेहूं की सिंचाई और गेहूं में पानी देने का समय गेहूं की सिंचाई और गेहूं में पानी देने का समय  गेहूँ की अच्छी पैदावार के लिए आवश्यक है की समय से फसल की सिचाई की जाए। आमतौर पर 3-4 सिचाई की आवश्यकता होती है. गेहूँ मे हमेशा हल्की सिचाई करनी चाहिए ताकि खेत मे 6-8 घंटों बाद पानी दिखाई न पड़े। अन्यथा अधिक जल-जमाव से पौधों मे पीलापन आ जाता है तथा श्वसन की क्रिया आस्थायी रूप से रुक जाती है ।


गेहूं की खेती
गेहूं की खेती

निकाई-गुड़ाई एवं खरतपतवार प्रबन्धन

गेहूँ की फसल में खरपतवार के कारण उपज में 10 से 40 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है । अतः खरपतवारों का नियंत्रण करना बहुत ही आवश्यक मन जाता है। गेहूँ की बुआई के 25-30 दिनों बाद अथवा प्रथम सिंचाई के पश्चात अपने हाथों की मदद से निकाई कर घास-पात निकालने से उपज पर अच्छा प्रभाव देखा गया है । इसके अलावा रसायनों द्वारा खरपतावार नियंत्रण की अवस्था में खेत में पर्याप्त नमी होना काफी महत्वपूर्ण होता है।


कीट एवं व्याधि प्रबंधन

गेहूं की फसल रोगों मे गेहूँ का कजराकीट ( Cut worm of wheat) और अनाकृत कलिका ( Loose smut ) ये दोनों रोग प्रमुख्य रोग है |

S.N फसल के नाम किट रोग के नाम रोग होने के कारण लक्षण
1. गेहूँ ( Wheat ) गेहूँ का कजराकीट ( Cut worm of wheat)   एग्रोटीस इप्सिलॉन ( Agrotis ipsilon ) छोटे पौधों को  विभिन्न जगह काटकर हानि पहुंचाते हैं।
2. गेहूँ ( Wheat ) अनाकृत कलिका ( Loose smut ) यूस्टिलागो ट्रिटिसी ( Ustilago tritici ) संक्रमित पौधों में बालियाँ पहले निकलती है।  बालियों में दानों की जगह कालाचूर्ण बन जाता है ।

खरपतवार

1. खरपतवार घास कुल के खरपतवार जैसे – गुल्ली डंडा ( वन गेहूँ ) , जगली जई आदि
2. सकरी पत्ती बाले खरपतवार
3. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
4. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के साथ बन गेहूँ
5. संकरी एवं चौड़ी पत्ती बाले खरपतवार

कटाई एवं दौनी

गेहूं की कटाई का समय गेहूं की कटाई का समय फसल पकने पर सुबह के समय ही कटाई करना चाहिये तथा कटाई के उपरांत जल्द ही दौनी कर बीज को अलग कर लेना चाहिये ।


भंडारण

भंडारण करने से पूर्व बीज को अच्छी तरह धूप में सुखा ले तथा बीज हेतु रखी जानी वाली किस्मों में दवा से उपचारित कर भण्डारण करना चाहिये ।

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तो दोस्तों मुझे आशा है कि आपको गेहूँ (Wheat) की खेती से जुड़ी जानकारी पसंद आयी होगी इस पोस्ट मे गेहूँ की खेती कैसे करें विस्तार से बताया गया है तथा इससे किसानों को कैसे ज्यादा से ज्यादा लाभ मिलेगा इसकी पूरी जानकारी दि गई है। अगर आपको इस पोस्ट से संबंधित कोई भीं सवाल हो तो आप हमसे कमेंट सेक्शन में पूछ सकते है।

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