Tuesday, May 21, 2024

Angur Ki Kheti : कैसें करे अंगूर की खेती, जानिए अंगूर की खेती से संबंधित पूरी जानकारी। Grapes Farming in Hindi

अंगूर जिसे लोग भली-भाँति जानते हैं और काफी पसंद भी करते है। अंगूर के खट्टे-मीठे टेस्ट के कारण लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं। अंगूर अपने मीठे स्वाद और पोषक तत्वों के लिए जाना जाता हैं। अंगूर लाल, हरे और काले रंग मे बाजरों मे देखने को मिलता हैं। अंगूर फल बहुत ही स्वादिष्ट एवं पौष्टिक होता हैं इसका सेवन करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता हैं।

भारत के प्रमुख अंगूर उत्पादन राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश शामिल हैं। महाराष्ट्र में सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती (Angur Ki Kheti) की जाती है तथा उत्पादन की दृष्टि से महाराष्ट्र देश में अग्रणी राज्य है। महाराष्ट्र देश में अंगूर का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। महाराष्ट्र का नासिक जिला इसका सबसे बड़ा अंगूर उत्पादन केंद्र है नासिक को भारत की अंगूर की राजधानी के रूप में जाना जाता है। प्रमुख अंगूर उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और मिजोरम हैं। 2020-21 के दौरान कुल उत्पादन का 71% से अधिक उत्पादन और देश में उच्चतम उत्पादकता के मामले में महाराष्ट्र पहले स्थान पर है। कर्नाटक 2020-21 में 24% की हिस्सेदारी के साथ अंगूर का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। बागवानी फसलों मे अंगूर अधिक आय देने वाली फसल हैं। अंगूर की खेती मे अच्छी आमदनी मिलने से किसान इसकी खेती व्यवसायिक तौर पर करते हैं और इसकी खेती से अच्छा मुनाफा कमाते हैं।

अंगूर का उपयोग हमारे देश मे मुख्यतः ताजे फल के रूप मे एवं मदिरा (wine) बनाने मे किया जाता हैं। वैसे तो अंगूर के कई उपयोग हैं इसे फल के तौर पर खाने के अलावा इनसे किशमिश, मुनक्का, जूस, जैम और जैली भी बनाए जाते हैं। भारत में अंगूर एक महत्वपूर्ण उपोष्णकटिबंधीय (sub-tropical) फल वाली फसल है। अंगूर की खेती (Grapes Farming) के लिए सर्वोत्तम तापमान (Optimum temperature) 28-320C को अच्छा माना जाता हैं।

Angur Ki Kheti
Angur

अंगूर के संकर किस्म (Angur ke kisme)

शरद सीडलेस (Sharad Seedless) परलैट (Perlat)
थॉम्पसन सीडलेस (thompson Seedless) काली शाहबी (Kali Shahabi)
गुलाबी (Gulabi) बंगलौर ब्लू (Bangalore Blue)
भोकरी (Bhokri) अनब-ए-शाही (Anab-e-shahi)
ब्यूटी सीडलेस (beauty seedless) पूसा सीडलेस (Pusa Seedless)
डिलाइट (delight)
बैंकूआ-आबाद (Bankua Aabad)
पूसा नवरंग (pusa navrang) पूसा उर्वशी (pusa urvashi)
चैम्पियन (champion) अर्ली-मस्केट (early-musket)
गोल्ड (Gold) कार्डिनल (Cardinal)
ब्लैक हैम्बर्ग (Black Hamburg)
ब्लैक प्रिंस (Black Prince)

अंगूर के संकर किस्म (Angur ke hybrid kisme)

अर्का तृष्णा (Arka Trishna) अरकावती (Arkavati)
अर्का सोमा (Arka Soma) अर्का हंस (Arka Hans)
अर्का कृष्णा (Arka Krishna) अर्का कंचन (Arka Kanchan)
अर्का चित्रा (Arka Chitra) अर्का श्याम (Arka Shyam)
अर्का राजसी (Arka Rajsi) अर्का श्वेता (Arka Shweta)

अंगूर की खेती के लिए मिट्टी एवं जलवायु (Angur ki kheti ke liye mitti or Climate)

अंगूर की खेती के लिए भारी मिट्टी, बहुत उथली मिट्टी, खराब जल निकासी वाली क्षारीय मिट्टी बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं होता हैं। यदि जलवायु उपयुक्त हो तो अंगूर को कई प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है। इसकी खेती के लिए अच्छी जल निकाश वाली बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती हैं। अंगूर की खेती (Angur Ki Kheti) अलग-अलग प्रकार की मिट्टियों मे की जा सकती हैं। इसकी खेती के लिए मिट्टी का पी0 एच0 मान 6.5 से 7.5 अच्छा माना जाता है।

इसकी खेती के लिए गर्म शुष्क एवं वर्षा रहित गर्मी तथा अति ठंड वाली सर्दी की मौसम की आवश्यकता होती हैं। अंगूर के फलों के पकने के समय मे वर्षा का होना इसकी खेती के लिए काफी नुकसानदायक होता हैं।

अंगूर का प्रवर्धन (Propagation of Grapes)

अंगूर की प्रजातियों का प्रवर्धन सामान्यरूप से तने की कलम से की जाती हैं कलमों की मोटाई पेंसिल के आकार, लंबाई 20 से 25 सेंटीमीटर जिनमे 3 से 4 स्वस्थ गांठे हो वो कलम के लिए उपयुक्त होता हैं। कलमों को शीत ऋतु मे निकालना चाहिए जब पौधों के सारे पत्ते गिर जाए एवं बेल सुषुप्त अवस्था मे चला जाए।

Angur Ki Kheti
Angur Ki Kheti
अंगूर की रोपाई का समय (Angur ki ropai ka samay)

अंगूर के कलमों का रोपाई का सबसे अच्छा समय जड़ वाली कलमों के लिए जनवरी-फरवरी और बिना जड़ वाली कलमों की रोपाई का समय अक्टूबर माह है। अंगूर के बेलों को मध्य जनवरी से मध्य फरवरी तक अंकुरण होने के पहले लगा देनी चाहिए।

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अंगूर की कलमों की रोपाई (Angur ki kalmo ki ropai kaise karen)

अंगूर के बेलों के बीच उचित दूरी रखना बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं किसानों को उचित दूरी पर ही रोपाई का कार्य करना चाहिए। रोपाई के लिए नवंबर-दिसंबर के महीने मे ही 75X75 सेंटीमीटर आकार के गड्डे खोद ले और उन गड्डों मे 10 किलोग्राम गोबर की खाद और एक किलोग्राम नीम की खल्ली को मिट्टी के साथ 1:1 अनुपात मे मिला देना चाहिए।

रोपण के लिए सामान्यतः दूरी नीचे दी गई सारणी के अनुसार रखा जाता हैं। 

हैन्ड सिस्टम (सिर प्रणाली) 2 मीटर X 2 मीटर
ट्रेलिस सिस्टम (सलाखें प्रणाली) 3 मीटर X 3 मीटर
बाँवर सिस्टम (कुंज प्रणाली) 4 मीटर X 4 मीटर
वाई प्रणाली 3 मीटर X 4 मीटर
अंगूर के बेलों की छंटाई (Pruning grape vines)

प्रथम 2 से 3 वर्षों तक बेलों में काट-छांट सधाई प्रणाली के अनुसार ढांचा तैयार करने हेतु की जाती है। बेलों से लगातार एवं अच्छी फसल लेने के लिए उनकी उचित समय पर छंटाई करना अति आवश्यक होता हैं। अंगूर के गुच्छे प्रत्येक मौसम में बेल से फूटने वाली नई टहनियों पर फैलते हैं अतः पिछली वर्ष के टहनियों की निश्चित लंबाई तक छंटाई करना महत्वपूर्ण माना जाता हैं। बेल को किस गांठ तक छंटाई की जाए यह किस्म की प्रबलता पर निर्भर करता हैं। मध्य दिसम्बर से मध्य जनवरी मे उत्तर भारत मे अंगूर की बेलों की छंटाई की जाती हैं क्योंकि उत्तर भारत मे शीतऋतु मे तापमान बहुत कम हो जाता हैं तापमान कम हो जाने से बेलें निष्क्रिय अवस्था मे चली जाती हैं जो की छंटाई के लिए अच्छा होता हैं।

अंगूर की बेल साधने की पद्धति

अंगूर की बेल साधने हेतु पण्डाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन एवं हैड आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं. लेकिन व्यवसायिक स्तर पर पण्डाल पद्धति ही अधिक उपयोगी सिद्ध हुयी है। 

अंगूर की फसल की सिंचाई (Angur ki sichai kab kare)

नई रोपाई की गई बेलों की सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए। खाद एवं उर्वरक देने के बाद भी सिंचाई करना आवश्यक होता हैं। सिंचाई तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 10 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। ड्रिप सिंचाई को अंगूर मे सिंचाई करने के लिए काफी अच्छा माना जाता हैं। ड्रिप के मध्यम से पौधों की जङो मे खाद एकसमान मात्रा मे चला जाता है जिससे खाद की भी बचत होती है और पौधों को एकसमान मात्रा मे खाद की पूर्ति होती है। 

Grapes
Grapes
अंगूर की फलों की तुङाई (Grapes harvest)

अंगूर की फलों की तुङाई उस समय करनी चाहिए जब अंगूर के गुच्छे पूरी तरह से पक जायें। फलों का पकना वांछित टीएसएस (TSS) एवं अम्लता के अनुपात से मापा जाता हैं जो की 25 से 35 के बीच रहता हैं। अंगूर टूटने के बाद नही पकते हैं इसलिए अंगूर को पूरी तरह से पकने के बाद की तोङना चाहिए। किसानों को अंगूरों की तोङाई करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसकी वास्तविकता न बिगङे। अंगूर के गुच्छे को बेल से तोङने के लिए किसी तेज कैंची का प्रयोग करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखे की तोङाई हमेशा सुबह या शाम मे करें।

अंगूर का भंडारण और डिब्बाबंदी (Storage and Canning of Grapes)

अगर अंगूर की डिब्बाबंदी की जा रही हैं तो इस बात का ध्यान रखे की गुच्छे मे से टूटे, संङे तथा खराब अंगूर के दानों को निकाल लेना चाहिए। भंडारण के दौरान अंगूर को सङने से बचाने के लिए इनमे सल्फर डाई-ऑक्साइड जनरेटरों का प्रयोग किया जाता हैं जो की अंगूर को सङने से बचाता हैं। सल्फर डाई-ऑक्साइड जनरेटर जिन्हे आमतौर पर अंगूर रक्षक के रूप मे जाना जाता हैं।

अंगूर की उपज (Grape yield)

अंगूर की उपज अंगूर की किस्म, खेत की मिट्टी की उर्वरता शक्ति, एवं इसकी कैसी देखभाल की गई है इस पर भी निर्भर करता है वैसे आमतौर पर इसकी उपज लगभग 15 से 35 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है इसकी उपज पूरी तरह से इसकी किस्म पर निर्भर करती है।

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अंगूर से संबंधित पूछे गए प्रश्न (Grapes FAQs)
अंगूर मे महक का कारण क्या होता हैं?
अंगूर मे महक का कारण मेथिल एन्थ्रेलिनेट (Methyl anthranilate) हैं।
अंगूर का वानस्पतिक नाम क्या हैं?
अंगूर का वानस्पतिक नाम वायटिस विनीफेरा (Vitis vinifera) हैं।
अंगूर का कुल वाइटेसी (Vitaceae) हैं।
किसमिस मे नमी 17 प्रतिशत से कम होना चाहिए।
अंगूर मे पाया जाने वाला अम्ल कौन सा हैं?
अंगूर मे टार्टरिक अम्ल (Tartaric acid) पाया जाता हैं।
अंगूर के खाने योग्य भाग को क्या कहते हैं?
अंगूर के खाने योग्य भाग को प्लेसेण्टा (Placenta) कहते हैं। 
अंगूर के फल के ऊपर पाए जाने वाले मोम जैसी परत को क्या कहते हैं?
अंगूर के फल के ऊपर पाए जाने वाले मोम जैसी परत को क्यूटिकल (cuticle) कहते हैं।
अंगूर का प्रवर्धन किसके द्वारा किया जाता हैं?
अंगूर का प्रवर्धन तने की कलम (hardwood cutting) द्वारा किया जाता हैं।
अंगूर वर्ष भर मे कितना बार फल देता हैं?
अंगूर वर्ष भर मे दो बार फल देता हैं?
अंगूर के फल में कितने प्रतिशत शर्करा पाई जाती है?
अंगूर के फल में लगभग 24 से 28 प्रतिशत शर्करा की मात्रा पाई जाती है।
अंगूर की खेती को क्या कहते हैं?
अंगूर की खेती (Angur Ki Kheti) को विटिकल्चर (Viticulture) कहते हैं।

तो मुझे आशा है कि आपको हमारा यह लेख पसंद आया होगा, अगर आपको पसंद आया है तो इस लेख को अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करे। और उन तक भी अंगूर की खेती (Grapes Farming in Hindi) के बारे मे जानकारी पहुँचाए।

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